यादें

Reading Time: 1 minutes

यादें भी कितनी अजीब होती हैं, हैं ना ? कुछ यादें गम में भी चेहरे पे मुस्कराहट ले आती हैं तो कुछ यादें ख़ुशी के पल में भी आँखें तर कर देती हैं. ना जाने कब किसकी याद आ जाए, यह कभी दस्तक दे कर नहीं आती हैं, बस आ जाती हैं. जब यादें आती हैं, तो हम कभी-कभी मुस्करा के या थोडा भावुक हो कर उन यादें को टरका देते हैं और वापस अपनी व्यस्त दुनिया में मशगूल हो जाते हैं. आखिर आज के ज़माने में यादों के लिए वक़्त किसके पास है. लेकिन कभी-कभी हम उन यादों को फिर से जीने के लिए कुछ हरकतें करते हैं, जिनसे वो बीते हुए पल ऐसा लगता है फिर से वापस आ गए थे.  यह हरकतें भी हर व्यक्ति के लिए अलग और अनोखी होती हैं.

जैसे, मुझे जब माँ की याद आती है, तो मैं दाल-चावल चम्च की जगह अपनी हाथों से दाल-चावल का कौर बना कर खाने लगता हूँ. कुछ पलों के लिए ही सही, पर ऐसा लगता है की माँ के हाथों का बना हुआ कौर खा रहा हूँ. जब पिताजी की याद आती है, तो एक गिलास पानी पी लेता हूँ क्यूंकि पिताजी कहते हैं की दिन में कम से कम बारह गिलास पानी पीना स्वसाथ के लिए लाभदायक है. जब बड़े भाई की याद आती है तो मैं थोड़ी शैतानी और नादानी करता हूँ, जिससे मेरा एक फ्लैटमेट गुस्सा होकर मुझे झिड़क देता है तो दूसरा फ्लैटमेट प्यार से मुझे समझाता है. ऐसा लगता है की बड़े भाई की डांट-फटकार और प्यार दोनों मिल गए अपनी नादानी पर.  जब मुझे जीवन तनावपूर्ण और नीरस लगने लगती है तो मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ , इशिता का चेहरा याद आता है और उसकी मनमोहक मुस्कान खुद-बा-खुद याद आ जाती है जो मेरे होठों पर भी मुस्कान बिखेर कर चली जाती है , सारा तनाव ना जाने कहाँ छूमंतर हो जाता है और जिंदगी फिर से हसीन लगने लगती है.

यादें भी कितनी अजीब होती हैं, हैं ना ? और हमारी हरकतें भी कितनी अजीब होती हैं, हैं ना ? हम खुद भी कितने अजीब होते हैं, हैं ना ?

( यह काल्पनिक निबंध है. आखिर क्या करूँ, लेखक हूँ, ऐसी कल्पना ना करूँ जो थोडा सच जैसा लगे, तो काहे का लेखक, हैं ना? )

One Reply to “यादें”

Leave a Reply