जान-पहचान

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चुन्नू और मुन्नू बस-स्टैंड पर खड़े थे | शायद वो बस का इंतज़ार कर रहे थे या शायद वो मुन्नी का इंतज़ार कर रहे थे | मुन्नी आई| मुन्नू उसे देख कर मुस्कुराया | मुन्नी ने उसे मुस्कुराते हुए देखा और फिर अपनी नज़र पलट कर किया उसे अनदेखा | चुन्नू ने मुन्नू को मुन्नी को देख मुस्कुराते हुए देखा और मुन्नी को मुन्नू के मुस्कराहट से मूँह फेरते हुए देखा|

बस आई| वो चली गई |  अब चुन्नू ने मुन्नू से शरारत भरी मुस्कान के साथ पूंछा “तुम तो कहते थे की तुम्हारी उससे जान-पहचान है लेकिन उसने तो तुम्हे देख कर मूँह फेर लिया” |

मुन्नू:“हाँ, क्यूंकि वो मुझे जानती नहीं है|”

चुन्नू: “हैं? भईया पहेली मत बुझाओ | तो तुम्हारी जान-पहचान कैसे हुई, यह बस बताओ |”

मुन्नू: “जान-पहचान का रिश्ता तो है | बताता हूँ कैसे | मैं उसे अपनी जान समझता हूँ और उसे मुझ जैसे सड़कछाप आशिकों की बहुत अच्छी तरह से पहचान है | तो हो गई ना जान-पहचान |”

चुन्नू: “मान गए उस्ताद | रिश्ते बनाने में तो आप बाप हो| आज से तो मेरी जान-पहचान भी कई लोगों के साथ बढ़ गई|”

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